Apr 25, 2013

Milkhi Ram Bhagat, PCS

 Milkhi Ram Bhagat (12 November, 1912 - 04 March, 1978)


एक परिचय
भारत विभाजन के बाद स्यालकोट से विस्थापित होकर पंजाब (भारतमें आए मेघ भगतों में से एक चेहरा भीड़ में बहुत ऊँचा हैश्री मिल्खी राम भगतअपने समुदाय के लिए बहुत कुछ करने के जज़्बे से भरे हुए श्री मिल्खी राम जी को लोग आज भी बहुत सम्मान और आदर के साथ याद करते हैंवे मेघ भगत समुदाय का एकमात्र ऐसा व्यक्तित्व हैं जिसने नौकरियाँ प्राप्त करने में एक-दो नहीं बल्कि अपने समुदाय के हज़ारों नौजवानों की मदद कीवे नौजवान आज ऊँचे ओहदों और पोज़िशन में हैं और आगे उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करके देश की सेवा में लगे हैंभगत जी के कार्य और व्यक्तित्व ने केवल मेघ समुदाय बल्कि अन्य समुदायों की हज़ारों ज़िंदगानियों को प्रभावित किया है.
श्री मिल्खी राम जी का जन्म 12 नवंबर 1918 में हुआउनकी प्रारंभिक पढ़ाई स्यालकोट के आर्य समाज स्कूल में हुईफिर वे ईसाई स्कूल में पढ़ेउन्होंने डीएवी कालेजलाहौर से 1939 में इंगलिश ऑनर्स के साथ बी.किया. 1940 में उन्होंने अविभाजित पंजाब के गवर्नर के कार्यालय में क्लर्क के तौर पर करियर की शुरुआत कीभारत विभाजन के बाद 19-9-1047 को उन्होंने शिमला में सहायक के तौर पर कार्यभार संभाला. 1950 में पंजाब सरकार में मंत्री रहे पृथ्वीसिंह आज़ाद की अनुशंसा पर वे पीसीएस नामित हुए और एक्स्ट्रा असिसटेंट कमिश्नर के पद पर रहेउसके बाद भगत जी के प्रयासों से कई अन्य मेघ भगत भी पीसीएस सेवाओं में आए.
भगत मिल्खी राम जी का गाँव गोहतपुर था जो स्यालकोट (अब पाकिस्तान मेंके पास ही थाभगत जी के दादा का नाम श्री भोलानाथ था और पिता का नाम श्री अमींचंदमाता का नाम मोहताब देवी थाउनकी एक बहन वीराँदेवी हैं जो 85 वर्ष की हैंनौकरी के सिलसिले में मिल्खी राम जी का परिवार चंडीगढ़ में बसापंजाब सरकार के शिड्यूल्ड कास्ट वेल्फेयर कार्पोरेशन में डायरेक्टर के पद पर रहते हुए अनुसूचित जातियों और अपने समुदाय के लिए उन्होंने बहुत कार्य किया.


Mr. Milkhi Ram Bhagat, Magistrate (Dharamshala)
1953 में उन्होंने गुरदासपुर में मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के तौर पर कार्य कियाफिर वे 1955 में स्थानांतरित हो कर बटाला में रेज़िडेंट मैजिस्ट्रेट हुए जहाँ उनके पास दंड देने की जूडीशियल शक्तियाँ थीं. 1956 में वे करनाल के डीसी के जीमैजिस्ट्रेट बने. 1959 में कंडाघाट (अब हिमाचल प्रदेश मेंमें एसडीएम नियुक्त हुए और नियमित डीसी की अनुपस्थिति में दो माह तक डीसी का कार्यभार भी संभाला. 1962 में फूड एंड सप्लाईज़ के तथा 1964 में इंडस्ट्रीज़ विभागों के अंडर सेक्रेटरी रहे. 13 नवंबर 1976 को वे सेहत विभागपंजाब सरकार से डिप्टी सैक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुएउनके सुपुत्र कर्नल राजकुमार ने बताया है कि भगत जी अपने लंबे करियर के अनुभव का लाभ सरकार को देना चाहते थे और उनकी हार्दिक इच्छा थी कि सेवानिवृत्ति के बाद शिड्यूल्डकास्ट कार्पोरेशनरोपड़ में मानद (honorary) सेवा देंलेकिन ऐसा नहीं हो सकाइससे वे बहुत निराश हुए और शायद यही उनकी सेहत के बिगड़ने का एक बड़ा कारण था. 04 अप्रैल 1978 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.

श्रीमती बलबीर भगत (15 November 1927 - 20 October 1980)


मिल्खी राम जी का विवाह 1944 में हुआ थाइनकी धर्मपत्नी का नाम श्रीमती बलबीर देवी भगत थासमाज सेवा के साथ-साथ ये भगत दंपति परिवार के लिए भी उतना ही समर्पित थाबच्चों की शिक्षा इनकी पहली प्राथमिकता थीइनके मार्गदर्शन में पूरे परिवार ने खूब प्रगति की है.

Family Photos




इनके सबसे बड़े पुत्र श्री राज कुमार आर्मी के कर्नल पद से रिटायर हुएदूसरे पुत्र श्री विजय भगत लीगल मीटरॉलॉजीफूड एंड सप्लाइज़ एंड कन्ज़यूमर अफ़ेयर्ज़ विभाग से असिसटेंट कंट्रोलर के पद से रियाटर हो चुके हैंसब से छोटे पुत्र श्री प्रदीप भगत इस समय चंडीगढ़ में आर्किटेक्चर कॉलेज के प्रिंसिपल हैं और विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय होने के साथ अपने क्षेत्र में अच्छा नाम कमा रहे हैंसब से बड़ी बेटी शशि भाटिया कैनेडा में बसी हैं जो फाइन आर्ट्स में स्नातक हैंइन्होंने फेडरल और प्रेविंशियल स्तर के कई अर्ध-न्यायायिक बोर्डों और ट्राइब्यूनलों में कार्य किया है जिनमें से दो प्रमुख हैं “इम्मीग्रेशन एंड रिफ्यूजी बोर्ड” और “सोशल बेनेफिट ट्राइब्यूनल”वर्तमान में ये कैनेडा के एसोसिएट नेशनल डिफेंस मिनिस्टर की ‘पॉलिसी एडवाइज़र-आऊटरीच’ के तौर पर कार्य कर रही हैंइसके अतिरिक्त ये ICCAD (Indo Canadian Cultural Association of Durham, Inc.) की चेयरपर्सन भी हैंसबसे छोटी बेटी स्नेहलता कुमार आईएएस हैं और हाल ही तक दिल्ली में ट्राइबल अफेयर्स मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक के तौर पर तैनात रही हैंस्नेहलता ने मध्यप्रदेश के सुदूर जनजातीय इलाकों की समस्याओं के समाधान के लिए बहुत कार्य किया हैवर्तमान में वे आयोजना आयोग में कन्सल्टेंट के तौर पर कार्यरत हैंमँझली बेटी सुनीता (एलएलबीसफल अधिवक्ता (वकीलऔर अपने क्षेत्र की बहुत लोकप्रिय सरपंच रहींउनका कुछ वर्ष पूर्व दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया था.
मेघ समुदाय को जब भी किसी सरकारी योजना (आरक्षण आदिका लाभ मिलने के हालात बनते थे तभी अन्य समुदाय इन्हें ब्राह्मण कह कर उन लाभों से वंचित कर देते थेआज़ादी के बाद भी ऐसा हुआजब दलित जातियों की अनुसूची बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई तब मेघ भगतों को इस सूची से निकालने की कवायद शुरू हो गईयह बात मिल्खी राम जी को दिल्ली से टेलिफोन पर एक मित्र से मालूम हुईबिना समय खोए उन्होंने अपने साथियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली जाकर लॉबिंग की और अपने समुदाय के हितों की रक्षा करने में सफल रहेआरक्षण का लाभ मिलने से देश में बसे हज़ारों मेघ भगतों के जीवन-स्तर और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आया हैइसका श्रेय भगत मिल्खी राम जी को जाता है.
वे मेघों की व्यक्तिगत समस्याओं के हल के लिए हमेशा सक्रिय रहते थेएक युवा मेघ को चंडीगढ़ के वेरका मिल्क प्लांट में अधिकारी की नौकरी मिली थीलेकिन उसकी जाति के कारण उसके अधिकारियों ने उसका नौकरी करना मुश्किल कर दियावह भगत जी के पास गयाभगत जी ने उसी समय फोन मिला कर वेरका के प्राधिकारी से पूछा, “आपके यहाँ स्टाफ में कितने शिड्यूल्ड कास्ट हैं?” उत्तर मिला, “एक.” भगत जी ने दूसरा सवाल पूछा, “क्या आप लोगों से एक आदमी भी बर्दाश्त नहीं होता?” अगले दिन युवा मेघ के हालात में सुधार आया.

जिन विभागों का कार्यभार इन्होंने सँभाला वहाँ कार्य का बोझ काफी अधिक थालेकिन इन्होंने सभी उत्तरदायित्व पूरी कार्यकुशलता से निभाएइन सभी नियमित व्यस्तताओं और थकान के बावजूद ये मेघ समुदाय के सदस्यों की बात ठंडे मन से सुनते और यथाशक्ति उनकी मदद करतेऐसी परिस्थितियों में कार्य करते हुए मैंने स्वयं उन्हें देखा है.
जहाँ तक इनकी धार्मिक मान्यताओं का प्रश्न है ये बहुत उदारमना रहेसभी धर्मस्थलों पर खुले मन से जाते थेबचपन की शिक्षा का ही प्रभाव था कि ये आर्य समाज में भी उतनी ही श्रद्धा से जाते जितना चर्च में.
जीवन भर इन्होंने अपने समुदाय की अथक और निस्वार्थ सेवा की और ज़रूरतमंदों को प्रश्रय दियाइनके इसी प्रेमभाव के कारण हज़ारों लोग आज भी इन्हें आदरपूर्वक याद करते हैंइनका जीवन और कार्य हमारे आने वाली पीढ़ियों और समाज सेवियों को हमेशा उजाले की राह दिखाएगाउन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
उक्त जानकारी देने में श्रीमती शशि भाटियाकर्नल राजकुमारश्री विजय भगत और श्रीमती वीराँदेवी ने अमूल्य सहयोग दिया हैउनका हार्दिक आभार.

Drawing room of Bhagat ji's house
जिन विभागों का कार्यभार इन्होंने सँभाला वहाँ कार्य का बोझ काफी अधिक था. लेकिन इन्होंने सभी उत्तरदायित्व पूरी कार्यकुशलता से निभाए. इन सभी नियमित व्यस्तताओं और थकान के बावजूद ये मेघ समुदाय के सदस्यों की बात ठंडे मन से सुनते और यथाशक्ति उनकी मदद करते. ऐसी परिस्थितियों में कार्य करते हुए मैंने स्वयं उन्हें देखा है.
जहाँ तक इनकी धार्मिक मान्यताओं का प्रश्न है ये बहुत उदारमना रहे. सभी धर्मस्थलों पर खुले मन से जाते थे. बचपन की शिक्षा का ही प्रभाव था कि ये आर्य समाज में भी उतनी ही श्रद्धा से जाते जितना चर्च में.
जीवन भर इन्होंने अपने समुदाय की अथक और निस्वार्थ सेवा की और ज़रूरतमंदों को प्रश्रय दिया. इनके इसी प्रेमभाव के कारण हज़ारों लोग आज भी इन्हें आदरपूर्वक याद करते हैं. इनका जीवन और कार्य हमारे आने वाली पीढ़ियों और समाज सेवियों को हमेशा उजाले की राह दिखाएगा. उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
उक्त जानकारी देने में श्रीमती शशि भाटिया, कर्नल राजकुमार, श्री विजय भगत और श्रीमती वीराँदेवी ने अमूल्य सहयोग दिया है. उनका हार्दिक आभार.
Col. Rajkumar Bhagat


Smt. Shashi Bhatia


Late Sh. Vijay Bhagat

Mr. Pradeep Bhagat




Notes of Shashi Bhatia received through email – शशि भाटिया के ईमेल से प्राप्त नोट्स
Anyone who knew Bauji still remembers him fondly. Even in Canada many people of my father's era speak about him with so much respect.  His passion, commitment and dedication to the needs of people was commendable and widely admired by those with whom he came in contact.

As a magistrate my Father always believed in reforming rather than sentencing. I have a vivid childhood memory of Bauji while serving as a magistrate in Karnal bringing a young man home from the law courts to our house because he had nowhere to go and was without a family to go to. My mother asked him to take Bauji's clothes to the Dhobi. Instead the young man took off with Bauji’s clothing and never returned. Of course Mamaji was quite upset. But typically my father urged forgiveness and understanding of the lad’s circumstances and of course this episode did nothing to change my father's  passion to help people.

While serving in Chandigarh I remembered Bauji was always encouraging young people to pursue higher education. He became a local guardian of many children from Himachal Pradesh who came to further their education in Chandigarh. My parents provided the comforts of home to those children supporting and guiding them. Many of them went on to successful and fulfilling lives and in later years would often return to express their appreciation for the assistance my father unselfishly gave them.

On the home front not only did he provide all his children with a nurturing, very protective and comfortable life but there was an additional element somewhat unusual for the time. Its fair to say that in those days Indian society followed traditional practices in which girls and boys were treated differently and faced different expectations. Today we would call it sexism. Thanks to my father’s progressive views all his children were treated equally. As a result his three daughters all received a higher education and were inspired to go on to lead productive professional lives.

Both my sisters and I have followed the path our father prepared. Sunita became a lawyer and successful and well liked politician who was elected Sarpunch and Sneh became a civil servant of the highest rank. In my case, although I graduated in “fine arts”, was my father disappointed with my choice of study? On the contrary not only did he support me in making my own decisions as to what to study but he always encouraged my every effort stressing that the important thing was to take responsibility for your actions and be the best that you can be.

It was that confidence which allowed me to be fully integrated into Canadian life.

On September 14, 2012 on behalf of Her Majesty Queen Elizabeth II I was honored to be awarded the with the Queen Elizabeth Diamond Jubilee Medal for my service to the community and Canada. I was humbled to receive this recognition and its no surprise that I dedicated it to his memory for at heart he made it possible.

जो कोई भी बाऊ जी को जानता था वह उन्हें बहुत प्रेम से आज भी याद करता है. यहाँ तक कि कैनेडा में भी उनके समय के कई लोग हैं जो उन्हें बहुत आदर से याद करते हैं. लोगों के प्रति उनका अनुराग, प्रतिबद्धता और समर्पण अनुकरणीय भी है और प्रशंसनीय भी.
मेरे पिता ने हमेशा सज़ा की बजाय सुधार में विश्वास रखा.  मुझे बाऊ जी की एक घटना की याद आती है जब वे करनाल में मजिस्ट्रेट थे. वे एक युवा को घर ले आए क्योंकि जिसका कोई पता-ठिकाना नहीं था (पक्का नहीं कि उसका कोई घर-परिवार था). मेरी माँ ने उसे बाऊ जी के कपड़े धोबी को देने के लिए दिए. वह युवा बाऊ जी के कपड़े बजाय धोबी के पास जाने के भाग गया और कभी नहीं लौटा. इससे परेशानी तो हुई लेकिन इससे लोगों की मदद करने वाले मेरे पिता के उत्साह में कोई कमी नहीं आई.
मुझे याद है कि चंडीगढ़ में नौकरी के दौरान बाऊ जी युवाओं को उच्चतर शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे. वे उन कई बच्चों के स्थानीय अभिभावक बन गए थे जो शिक्षा प्राप्ति के लिए हिमाचल प्रदेश से चंडीगढ़ आए थे. मेरे माता-पिता ने उन बच्चों को घर जैसी सुविधाएँ दीं, सहायता की और मार्गदर्शन दिया. उनमें से कई आज बहुत अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं.
उन्होंने अपने सभी बच्चों को बहुत सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन दिया. 
मैं यह भी कहना चाहूँगी कि जब उनकी तीनों बेटियाँ बड़ी हो रही थीं उस समय लड़कियों का घर से निकलना बहुत सुरक्षित नहीं माना जाता था. लेकिन मेरे परिवार में ऐसा नहीं था. मेरी दोनों बहनों को और मुझे जीवन को रचनात्मक तथा व्यावसायिक बनाने के लिए प्रेरणा घर में मिली. सुनीता सफल अधिवक्ता (वकील) और बहुत लोकप्रिय सरपंच रहीं और स्नेह उच्चतम सिविल सेवा में हैं और मेरे मामले में, यद्पि मैने फाइन आर्ट्स में स्नातक किया था, क्या मेरे पिता मेरे चुने हुए अध्ययन विषय से निराश थे? नहीं इसके विपरीत उन्होंने मुझे अपना निर्णय लेने में सहायता की कि मुझे किन विषयों का अध्ययन करना चाहिए और मेरे प्रत्येक प्रयास को उनका समर्थन मिला. यही वह विश्वास था जिसने मुझे कैनेडा के जीवन में पूरी तरह रम जाने की शक्ति दी.
14 सितंबर, 2012 को मुझे महारानी एलिज़ाबेथ-II की ओर से क्वीन एलिज़ाबेथ डायमंड जुबली मेडल दिया गया है जो समुदाय और कैनेडा की सेवा के लिए प्रदान किया गया है. मैं इस सम्मान को विनम्रता से ले रही हूँ और यह सम्मान मैं अपने पिता को समर्पित कर रही हूँ. 
यह सब इसलिए कह रही हूँ कि बात बच्चों की परवरिश की थी और मेरे पिता का दृष्टिकोण बहुत सकारात्मक था. 



Linked to Our Pioneers

Budda Mal Bhagat

Bhagat Budda Mal


सन् 1947 में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए और जालंधर में बसे मेघ भगत समाज में लगभग सभी लोग एक नाम से भली-भाँति परिचित हैं- भगत बुड्डामल. भार्गव कैंप, जालंधर में उनके नाम से एक ग्राऊँड बना है जिसे भगत बुड्डामल ग्राऊँड कहते हैं.

विडंबना है कि आज मेघ भगत समाज में बहुत कम लोग इस सामाजिक कार्यकर्ता के बारे में विस्तार से जानते हैं जिसने अपने समुदाय के लिए जीवन भर अथक परिश्रम किया ताकि यह समुदाय भविष्य में भली प्रकार से ससम्मान जीवन व्यतीत कर सके.
उनका जन्म और पालन-पोषण स्यालकोट, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था. वे मेघ जाति के एक सामान्य परिवार में जन्मे थे. बहुत शिक्षित नहीं थे. लेकिन छोटी आयु में ही वे समाज सेवा के कार्य में प्रवृत्त हो गए थे. भारत में आने के बाद तो वे आजीवन समाज सेवा में रहे. मैंने स्वयं उन्हें अमृतसर, जालंधर और चंड़ीगढ़ में समाज सेवा में सक्रिय देखा है.
  
उनकी दिनचर्या ही थी कि वे सहायता माँगने आए किसी भी आगंतुक के साथ हो लेते और उसकी भरपूर मदद करते. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे अन्य मेघ भगतों की भाँति भार्गव कैंप, जालंधर में बस गए. यहाँ रहते हुए उन्होंने भगत गोपीचंद के साथ मिल कर बहुत कार्य अपने समाज के लिए किया. वे कई बार जालंधर म्युनिसिपल कार्पोरेशन के सदस्य चुने गए. वे अकेले या अपने साथी सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में आते रहे और यहाँ भगत मिल्खीराम (पीसीएस), श्री केसरनाथ जी, सत्यव्रत शास्त्री जी आदि के साथ मिल कर उन्होंने बहुत से लोगों के नौकरियों आदि से संबंधित कार्य कराए जिससे समुदाय के लोगों को लाभ पहुँचा.
उन्होंने जीवनभर विवाह नहीं किया और ब्रह्मचारी रहे. दमकता हुआ गोरा चेहरा. लंबा कुर्ता, तुर्रे वाली अफ़ग़ानी पगड़ी और पठानी सलवार पहनने वाले बुड्डामल जी का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक और प्रभावपूर्ण था. वे धीरे-धीरे प्रेमपूर्वक और ठहरी हुई बात करते थे.

उनके कार्य और समाज सेवा के मद्देनज़र सरकार ने उनकी स्मृति में भार्गव कैंप में श्री बुड्डामल पार्क बना दिया और उनके कार्य के महत्व को मान्यता दी.
श्री बुड्डामल जी के जन्म-मृत्यु के बारे में मेरे पास अभी कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. पार्क बनने के साथ उनका नाम अमर तो हो गया लेकिन उनके बारे में अभी बहुत-सी जानकारियाँ जुटाई जानी बाकी हैं. अभी हाल ही में भगत चूनी लाल भगत के नागरिक अभिनंदन समारोह में श्री बुड्डामल जी को याद किया गया था.

अब बेहतर हो कि हमारे सामाजिक संगठन अपने पूर्ववर्ती सामाजिक कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी जुटाएँ और समय-समय पर उनके संबंध में उपलब्ध सामग्री को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का उपक्रम करें आखिर वे हमारे लिए कल्याणकारी सोच रखने वाले प्रेरणा स्रोत हैं.
मेरे विचार से भगत बुड्डामल पार्क में उनकी मूर्ति लगाई जानी चाहिए ताकि आने वाले समय में हम सभी उनके कार्य से प्रेरणा ले सकें. यहाँ के वाटर टैंक पर 'बुड्डामल पार्क' लिखा जा सकता है ताकि पार्क का नाम दूर से पढ़ा जा सके.

Bhagat Hans Raj Advocate - भगत हंसराज एडवोकेट


यह वही समय था जब 1882 में भारत सरकार द्वारा कराई गई पहली जनगणना से मालूम हुआ कि अछूत कहे जाने वाले कई लाख लोग नाम के ही हिंदू थे. उन्हें अपनी मर्ज़ी के मुताबिक काम करने और शिक्षा लेने का हक़ नहीं था. और हर तरफ़ शोर मचाया जा रहा था कि उन्हें ईसाई बनाया जा रहा है.


यह वही समय था जब पंजाब में आर्यसमाज की स्थापना हो चुकी थी. पंजाब के आर्यसमाजी कार्यकर्ता लाला गंगाराम ने बताया कि 1880 में मेघों ने स्यालकोट के आर्यसमाजियों को अर्ज़ी दी थी कि उनके सामाजिक स्तर का  फिर से र्निधारण किया जाए और स्तर को ऊँचा उठाया जाए. गंगाराम ने ईसाई, इस्लाम और सिख धर्मों के उदाहरण दिए जिनमें जाति और धर्म आधारित भेदभाव नहीं था. लेकिन हिंदुओं ने पूरी कड़ुवाहट के साथ इसका लगातार विरोध किया. (मेघों ने ऐसा कोई आवेदन किया था या नहीं इसकी पुष्टि अभी बाकी है). कहा जाता है कि लाला गंगाराम के लगातार दबाव डालने से आर्यसमाज की कार्यकारी समिति ने यह काम एक रजिस्टर्ड संस्था 'आर्य मेघ उद्धार सभा' को देने का फैसला किया. इस संस्था की अगुआई लाला गंगाराम ख़ुद कर रहा था.


यह वही समय था जब मेघों का 'शुद्धिकरण' करके उन्हें हिंदुओं की सबसे निचली जातियों में ऱखा गया और आर्यसमाज में दाख़िल किया गया. आर्यसमाज का दावा था कि स्यालकोट के 36000 मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें ‘आर्य-भक्त’ बनाया गया था.


कहा जाता है कि लाला गंगाराम ने मेघों को 'भगत' कहा था और मेघों ने 'भगत' नामकरण स्वीकार कर लिया क्योंकि इस क्षेत्र में अधिकांश मेघ मध्यकालीन संतों कबीर आदि के प्रति आस्था रखते थे. उन संतों को भारतीय समाज सदियों से 'भगत' कहता आ रहा था.


उन हालात में डालोवाली गाँव के हंसराज भगत और ननजवाल गाँव के जगदीश मित्र ने 1935 तक आर्यसमाज की मुहिम के तहत शिक्षा प्राप्त की और दोनों ने LLB की.


उधर सन् 1925 में बाबू मंगूराम मुग्गोवालिया, गाँव मुग्गोवाल, तहसील गढ़शंकर, ज़िला होशियारपुर ने एक आदधर्म मुहिम शुरू की. यह मुहिम अछूतों के इस पक्ष को रेखांकित करती थी कि वे भारत में आर्यों के आने से पहले ही सप्त-सिंधु या ग्रेटर पंजाब में बसे हुए थे. इस मुहिम के असर को रोकने के लिए आर्यसमाज ने पूरी ताकत लगा दी. आदधर्म आंदोलन मेघ समुदाय को अधिक प्रभावित नहीं कर सका क्योंकि यह समुदाय काफी हद तक आर्यसमाज से प्रभावित था.


बताना ठीक ही होगा कि आर्यसमाज द्वारा शिक्षित दो युवकों में से पहले जगदीश मित्र की ज़िंदगी छोटी रही. दूसरे युवक हंसराज ने स्यालकोट में वकालत शुरू कर दी. उन्होंने एक आदधर्मी लड़की से विवाह किया. आर्यसमाजियों को यही बात पसंद नहीं आई. इसी वजह से भगत हंसराज के आर्यसमाजी दोस्त उनकी शादी में शामिल नहीं हुए. खासकर यह वजह बता कर कि शुद्ध किए गए आर्य-भक्त मेघ अन्य की तुलना में ऊँची जाति के हैं और कि आद धर्मियों के साथ उनका 'रोटी-बेटी' का संबंध नहीं रहा था. लेकिन हंसराज जी डॉ. भीमराव अंम्बेडकर और बाबू मुग्गोवालिया के विचारों से प्रभावित थे. अंबेडकर के विचारों के अनुरूप हंसराज चाहते थे कि दलित लोग जाति व्यवस्था से ऊपर उठें.


उधर लाला गंगाराम ने अपने नेतृत्व में बनवाई 'मेघ उद्धार सभा' के लिए अंग्रेज़ सरकार से कुछ बंजर ज़मीन लीज़ पर ली जो तहसील खानेवाल, ज़िला मुल्तान में पडती थी. इस पर कुछ मेघ परिवारों को बसा कर उन्हें खेती करने के लिए रखा गया. इस भूखंड को 'आर्य नगर' नाम दिया गया. खेती करने वाले मेघों को फसल का 50 प्रतिशत हिस्सा मिलता था. आगे चल कर मेघ टेनेंट्स ने दबाव बनाया कि उनका हिस्सा दो तिहाई किया जाए. लाला गंगाराम इस पर राज़ी नहीं था और उसके साथ कुछ हाथापाई भी हुई.


कानून के जानकार हंसराज ने 'मेघ उद्धार सभा' के नाम से बने ट्रस्ट द्वारा इन बँटाईदार (Share cropper) मेघों के शोषण की हालत को जाना. यह ज़मीन अंग्रेज़ सरकार ने ट्रस्ट को लीज़ पर दी थी जबकि बँटाईदार के तौर पर मेघों का मेहनताना बहुत कम रखा गया था. समाजसेवा की आढ़ में हो रहे इस नाटक के पीछे कुछ गलत था. हाथापाई हुई. एक अदालती केस एडवोकेट हंसराज की अगुवाई में कोर्ट ले जाया गया. ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व गंगाराम कर रहा था. एडवोकेट हंसराज केस जीत गए. उन्होंने यह केस मेघों के तथाकथित महान सुधारक लाला गंगाराम के विरुद्ध जीता था. केस जीतने के बाद वे बँटाईदार मेघ-किसान कानूनन ज़मीनों के मालिक बन गए. श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया है कि जालंधर के कुछ आर्यसमाजी मेघ कहते हैं कि भगत हंसराज ने मेघों को आर्यनगर की ज़मीन का वाजिब हक़ दिलाने के लिए जो मुक़द्दमा किया था उस पर अदालती निर्णय न हो कर बाहर ही समझौता हो गया था.



हंसराज जी 1935 तक आर्यसमाज की मदद से हुई अपनी शिक्षा के लिए आर्यसमाज के आभारी थे लेकिन शिक्षा की बदौलत वे दलितों की हालत को बदतर बनाने के तरीकों को भली प्रकार समझने लगे थे. डॉ. अंबेडकर और बाबू मंगूराम के प्रति वे लगाव रखने लगे थे. यह उन आर्यसमाजियों को पसंद नहीं आया जो हंसराज को शिक्षा के लिए दी गई वित्तीय सहायता के बदले उनमें एक हिंदूवादी और आर्यसमाजी कार्यकर्ता देखने का सपना पाले हुए थे. असल में उन्हें यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि हंसराज अपने समाज के लोगों को न्याय दिलाने के लिए अदालत चला जाएगा और केस भी जीत जाएगा.


लोग बताते हैं कि जिस मेघ समूह ने आदधर्मी लड़की से शादी करने पर हंसराज भगत का सामाजिक बहिष्कार किया था उसी समूह ने आगे चल कर अविभाजित पंजाब के विधानसभा चुनाव में हंसराज के विरुद्ध खड़े चौधरी सुंदर सिंह के हक में सक्रिय रूप से प्रचार करके मेघों के वोट दिलाए. ये चौधरी सुंदर सिंह आदधर्मी थे. यानि मेघों ने एक आदधर्मी लड़की से शादी करने वाले मेघ को वोट न देकर एक आदधर्मी नेता को वोट दे दिया. श्री सुंदर सिंह एक अच्छे नेता थे लेकिन इससे मेघ समुदाय के व्यवहार का एक हानिकारक अंतर्विरोध सामने आया.


कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा अक्तूबर 1966 में प्रकाशित 'डॉ. अंबेडकर का साहित्य और संभाषण' (Writings and Speeches of Dr. Ambedkar, published by Ministry of Welfare, G.O.I., New Delhi, Oct. 1966 Edition) से यह रुचिकर बात पता चलती है कि पंजाब के आर्य हिंदू इस बात पर असहमत थे कि मेघ अछूतों में आते थे. हालाँकि मेघ ऐतिहासिक रूप से छुआछूत का शिकार रहे थे. डॉ. अंबेडकर से समर्थन प्राप्त हंसराज जी के प्रयासों से मेघों को अनुसूचित जातियों में रखा गया. यदि आर्य हिंदू सफल हो जाते तो आज़ादी के बाद मेघों को नौकरियों में आरक्षण का वो फायदा नहीं मिलता जिसकी वजह से वे कुछ तरक्की कर पाए हैं.


यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि हंसराज जी ने 1937 में स्टेट असेंबली चुनावों में यूनियनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इलैक्शन लड़ा था और वे कांग्रेस के चौधरी सुंदर सिंह से चुनाव हारे. इसकी वजह यह रही कि चिढ़े हुए आर्यसमाजियों ने गाँव पोथाँ, ज़िला स्यालकोट के निवासी भगत गोपीचंद को उनके खिलाफ चुनाव में खड़ा कर दिया. नतीजतन मेघों के वोट बँट गए. आगे चल कर 1945 में भगत हंसराज को आदधर्मी समुदाय और यूनियनिस्ट पार्टी का समर्थन मिला और वे यूनियनिस्ट पार्टी की ओर से नामांकित हो कर विधान परिषद के सदस्य बने और अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व किया.


पंजाब के हिंदू, मुसलमानों, दलितों और सिखों के हितों का ध्यान रखने के लिए गठित दस सदस्यीय 'पंजाब स्टेट फ्रैंचाइज़ कमेटी' में एडवोकेट हंसराज और जनाब के. बी. दीन मोहम्मद को सदस्य नियुक्त किया गया. हिंदुओं में सर छोटूराम और पंडित नायक चंद भी इसमें सदस्य थे. समिति के नौ सदस्यों (हिंदू और एक सिख प्रतिनिधि) ने रिपोर्ट दी कि यह कहना मुमकिन नहीं था कि उस समय के अविभाजित पजाब में कोई ऐसे दलित समुदाय थे जिनके धर्म को लेकर उनके सिविल अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो. लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि गाँवों में ऐसे वर्ग थे जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति निश्चित रूप से बहुत खराब थी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हालाँकि मुस्लिमों में कोई दलित नही हैं फिर भी हिंदुओं और सिखों में दलित थे और कि उस समय के अविभाजित पंजाब में उनकी कुल जनसंख्या 1,30,709 थी.


कुल मिला कर उस समिति ने बहुमत के साथ इंकार कर दिया था कि पंजाब में दलितों या अछूतों का कोई अस्तित्व था. लेकिन एडवोकेट हंसराज ने अपना एक अलग असहमति (dissenting) नोट दिया जिसमें कहा गया था कि समिति ने दलित समुदायों की जो सूची दी थी वो सूची अपूर्ण थी क्योंकि मेघों सहित कई समुदायों को उस सूची से बाहर रखा गया था. उनके उस असहमति नोट को महत्व दिया गया और पंजाब के दलित समुदायों को अनुसूचित जातियों में शामिल किया गया.


भारत विभाजन के बाद सेटेलमेंट मंत्रालय में एडवाइज़र सुश्री रामेश्वरी नेहरू, भगत हंसराज, श्री दौलत राम (मेघ), भगत गोपीचंद और भगत बुड्ढामल सभी ने समन्वित प्रयास किया और स्यालकोट से भारत में आए मेघों को अलवर (राजस्थान) आदि जगहों पर ज़मीनें दिला कर बसाया गया. भगत हंसराज राजनीतिक रूप से सक्रिय थे, श्री दौलत राम सेटेलमेंट ऑफिसर थे. इस टीम ने बहुत अच्छा कार्य किया और सफल रही. लाभ उठाने वाले भगतों में वे लोग भी शामिल थे जो कभी हंसराज भगत के विरोधी रहे थे.


आर्यसमाज और लाला गंगाराम का प्रयोजन और उद्देश्य चाहे कुछ भी क्यों न रहा हो, उन्होंने मेघों की शिक्षा के लिए जितना भी किया वह मेघों के लिए लाभकारी हुआ. आज़ादी के बाद मेघ समुदाय आर्यसमाज के एजेंडा में कहीं नहीं दिखा.


दूसरी ओर एडवोकेट भगत हंसराज और डॉ. अंबेडकर ने पंजाब के मेघों और अन्य दलित जातियों को अनुसूचित जातियों की अनुसूची में शामिल कराने के लिए जो संघर्ष और कार्य किया उसने उनकी आर्थिक हालत को सुधारा. वे लाखों की संख्या में निम्न मध्यम वर्ग में आ गए.


यह कहना उचित ही है कि एडवोकेट हंसराज भगत मेघों के अग्रणी हीरो हैं. जिनके संघर्ष की बदौलत मेघों को लाभ हुआ जिसे आने वाली पीढ़ियाँ भी महसूस करेंगी.


1947 में भारत में आने के बाद हंसराज भगत दिल्ली के करोल बाग में रहने लगे. वहाँ वे वकील के रूप में कार्य करते रहे. उनके जन्म आदि की सही तिथियाँ ज्ञात नहीं हो सकी हैं. स्टेट असेंबली की एक पुरानी फोटो के अलावा उनकी कोई अपनी या पारिवारिक फोटो नहीं मिली है. हंसराज जी का परिवार संभवतः विदेश में बस गया था.

(उक्त जानकारियाँ सर्वश्री आर.एल. गोत्रा, यशपाल जी, मोहिंदर पाल और डॉ. ध्यान सिंह के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं. उनका आभार. एडवोकेट भगत हंसराज जी के बारे में बेसिक जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई है. यदि कोई सज्जन उसकी तथ्यात्मक जानकारी दे सकें तो इस ई-मेल bhagat.bb@gmail.com पर भेज सकते हैं.)
(Unionist Party से 1937 में बनी विधान सभा/परिषद के सदस्यों का ग्रुप फोटो)
(मेघों की सहूलियत के लिए बताना आवश्यक है कि ऊपर आखिरी पंक्ति में बाएँ से 11वें व्यक्ति भगत हंसराज, एडवोकेट हैं जो खिड़की के आगे खड़े हैं. उन्हें आदधर्म समाज की ओर से विधान परिषद के लिए नामित किया गया था. आगे चल कर उन्होंने डॉ. अंबेडकर के साथ मिल कर अविभाजित पंजाब की अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. य़ह फोटो उपलब्ध कराने के लिए श्री सुरजीत सिंह भगत (लुधियाना) और श्री राजकुमार भगत (जालंधर) का आभार.)

Hans Raj Bhagat, Advocate (as narrated by Sh. R.L. Gottra):-


ADVOCATE HANS RAJ (हंसराज भगत, एडवोकेट), THE REAL (Written by Rattan Gottra, Jalandhar) Advocate Hans Raj, originally R/o Vill. Dalowali, Dist. Sialkot (Pakistan) is greatly remembered for fighting against the Aryan culture of economic and political exploitation, for being instrumental in getting reservation in politics and services for Meghs under various provisions by the Government of India, and for getting them allotted the agricultural land after the Partition of India. The circumstances under which he accomplished this task are mentioned here. LAND OWNERSHIP RIGHTS: It may be mentioned that Arya Samaj, Sialkot (Pakistan) had got registered a 'Charitable Trust' named 'Megh Uddhar Sabha', managed by Ganga Ram, in the first quarter of twentieth century to promote education among the 'Dalits', as a part of their strategy to keep them away from conversion to Sikhism and Islam. It was a time when all religious organizations namely Islam, Hinduism & Sikhism in Punjab were to some extent competing with each other in this connection from demographic view-point to safeguard their respective future political interests. To float an educated leadership for that purpose among the Hindu Meghs, they had borne the expenses of education in law for two persons namely Hans Raj, and Jagdish Mitter respectively, both of whom completed their LLB degrees in 1935. Jagdish Mitter unfortunately died shortly after his education. Hans Raj Advocate after joining his profession in law came into contact with various political personalities including Mangu Ram Mugowalia (Dist. Hoshiarpur), an Ambedkarite, who had already started Ad-Dharam movement in Punjab; and through whom he also came into touch with Dr. Ambedkar as well. Consequently, the philosophy Ambedkarism turned him into a much rationalist and a humanist than a traditionalist. Advocate Hans Raj deeply observed the country's political scenario, as well as the miserable economic plight of Meghs including those employed as share-cropper farm laborers under the said 'Megh Uddhar Sabha'. These farm-laborers had converted the barren land into a very fertile land that had been got on lease from the British Government for charitable purpose. The Meghs employed there were quite justified in expecting 50% of crop as their justifiable share or remuneration, particularly when land was for charitable purpose. However, they were paid only one-third of the crop as their share. While observing their miserable plight, Advocate Hans Raj felt very much pained due to this economic exploitation of Megh farm-laborers at Arya Nagar, Teh. Khanewal, Dist. Multan; but, their demands were rejected by the 'Trust'. Consequently, there was also learnt to be some bitter altercation between 'Trust' authorities and farm laborers. Consequently, due to this dishonest drama of 'Charity', Advocate Hans Raj revolted against the Arya Samaj, and won a court case against the said 'Trust', practically managed by Arya Samaj, who are rather pompously described by many as great social reformers for Meghs of Punjab. Sensing their defeat, just before the announcement of court's verdict, the 'Trust' authorities, to save their honor had verbally announced that the share-croppers were the owners of land allotted to them for cultivation! As a result of favorable verdict in this case, the share cropper Meghs became full fledged land-owners, because Advocate Hans Raj had wisely represented their case before the court. RESERVATION: Dr. Ambedkar had laid the foundation for empowerment of 'Dalits' by signing the 'Poona Pact'. Through his advice and suggestions in the Governing Council of India under British Government, it was possible to implement the 'reservation system' derived from the Poona Pact. For this purpose, Dr. Ambedkar was made member of the Indian Franchise Committee, which was empowered to form the State Franchise Committees for each state to decide about the quantum of separate political representation of 'Dalits' in the legislative bodies based upon the extent of SC/ST population in each state, as per the provisions contained in Government of India Act-1935. Advocate Hans Raj worked for preparing of schedules (lists) of socially and economically deprived castes, tribes and communities. As per the 'Writings & Speeches' of Dr. BR Ambedkar, a ten member Punjab State Franchise Committee consisting of Hindu, Muslim, 'Dalits', and Sikh representatives was appointed to investigate and identify communities or castes/tribes that were both socially and economically weaker for the purpose of giving them representation in political structure of India, as well as in the services. Advocate Hans Raj and K.B. Deen Mohammad (Megh, converted to Islam) were appointed as members to represent and look after the interests of 'Dalits' of Punjab in their studies on the subject. Among the Hindus, Chhotu Ram and Pt. Nanak Chand (both Arya Samajists) were also the members. After their study, nine members of the Committee (including Hindus and a Sikh) reported that in the then undivided Punjab, it was impossible to say that there were any 'Dalits' or SC/ST communities whose civil rights were violated because of their respective religions. However, they added that there were some classes in the villages whose economic and social situation was definitely miserable. They also reported that though there were no 'Dalits' among the Muslims, yet there were 'Dalits' among Hindus and Sikhs and their total population at that time was shown 1,30,709 only! The Meghs and some other communities were not mentioned in their report and the figures of population were astonishingly shown to be too low. Thus, the Committee of Punjab in its majority opinion had flatly denied the existence of any 'Dalit' or 'Untouchables' in Punjab. Actually, the term 'Dalit' was used was used by Dr. Ambedkar for the 'Untouchables' (Aachhoot), so as not to hurt anybody's feelings. However, Advocate Hans Raj in his separate (dissenting) independent report mentioned that the list of 'Dalit' communities was incomplete; because many communities (including Meghs) were left out during the study. More or less, similar reports were received from other states of India, because of the dishonesty demonstrated by the high caste members including the Arya Samajis. Those very Hindus who never disputed the existence of population of 'Untouchables' upto 1931-12 Census report started denying their existence! Because, they imagined that the quantum of Hindu seats might get reduced by relinquishing a share of it in favor of 'Dalits' in proportion to their population. KB Deen Mohd. was under the pressure of Islamist fundamentalists, who believed that all Islamists were equal in the eyes of 'Allah' and therefore, he was supposed not to report any 'Muslim' as 'Dalit' so as to demonstrate the superiority of Islam. In reality, the leadership of Muslim League (like the high-caste Hindus), also felt that if a section of Muslims were declared as 'Dalits', they would be demographically at a great disadvantage in any future course of political action in already Hindu-dominated India. Therefore, he reported that though there were some economically weaker people, yet there was no social discrimination among the Muslims. Ultimately, Dr. Ambedkar accepted the recommendations of Advocate Hans Raj, and Meghs along-with others like Ad-Dharmis, Ramdassia, Ravidassia, Julaha, etc. were included in the Scheduled Castes list. Simultaneously, the Arya Samajists had started propagating among 'Dalits' that in view of government's attempt to enlist the 'Untouchables' as Scheduled Castes, if any of the communities among them got registered in that list, it may result into permanent stigma for them to be called as such 'Untouchables'. This propaganda was particularly carried on through the Arya Samaj priests throughout Punjab. A good majority of these priests included the Megh Purohits who by then had been educated upto primary or elementary level in the Arya Schools run by Arya Samaj and had thus been brain-washed. Consequent to this propaganda, many of the Meghs and Kabir-Panthis even gave out to the 1941 and 1951 census operations authorities that they were Bhagats i.e. not Meghs. But later on, when they realized the benefits of reservation, they gradually reverted back to give out the true information that they belonged to Megh community. This is the very unique example of how the ignorant people through repitition of an un-truth over a hundred times or so can be be-fooled by 'Hindutva' zealots. ALLOTMENT OF LAND TO MEGH MIGRANTS: After the Partition (1947) of India, Advocate Hans Raj migrated to Delhi, and established contacts with Rameshwari Nehru (Raina) w/o Brij Lal Nehru, nephew of Motilal Nehru and cousin Jawaharlal Nehru. Rameshwari at that time had been doing commendable work for saving, tracing and resettling displaced persons who had migrated from Pakistan to India. In 1949 she was appointed Adviser to the Ministry of Rehabilitation, Government of India. Advocate Hans Raj explained to her the miserable plight of displaced migrant farm-labor Meghs from Pakistan and requested her to get issued orders for allotment of evacuees land to them. She agreed for allotment of agricultural land to migrant Meghs in Dist. Alwar, Rajasthan. Late Advocate Daulat Ram, MA, LLB, (a Megh with helpful attitude) R/o Jammu-Tawi was the Settlement Officer, Rehabilitation Deptt., GOI, Stationed at Jalandhar to look after the cases of re-settlement of migrant refugees in Punjab. Advocate Hans Raj remained in touch with him for the implementation of the Government's orders. From among the displaced migrants, two prominent persons Bhagat Gopi Chand, and Bhagat Buddha Mal (both educated up-to Under-Matriculation and Primary levels respectively) were made to remain in touch with Advocate Daulat Ram for paper-work formalities. This is how the allotment
of land in Alwar was got accomplished by Advocate Hans Raj, and Advocate Daulat Ram respectively, without whose initiative and sincere efforts, all of it could not have been possible. POLITICAL REPRESENTATION: Under the Government of India Act-1935, the British Government held popular elections and constitued the state assemblies in 1937. It gave the provincial assemblies full responsibility for government. Much before the announcement of elections, Advocate Hans Raj had got married with a lady belonging to Ad-Dharam community with the object to create an example of unity among the 'Dalits'. However, when before the marriage, he had sent invitations to prominent persons including Meghs and some Arya Samaji friends, most of them not only boycotted his marriage party, but also expelled him from the 'Biradari', apparently on the plea that 'Bhagats' (new name acquired by Meghs from Arya Samaj activist Ganga Ram) stood at a bit higher social level from the Ad-Dharmis and that gravity of his deviation from the established social norms was not pardonable. Behind this drama, there was said to be mischievous hand of Arya Samaj activists, as they intended to take revenge for his having contacts with Ambedkarites, as well as for filing a court case to secure the land-ownership rights from the 'Trust' managed by the Arya Samaj. Consequently, before the 1937 elections to Punjab State Assembly, while assessing his mass base, Advocate Hans Raj decided to join the Unionist Party of India (led by Sikander Hayat Khan) that included both the Hindus and the Muslims and stood against the Partition of India. He contested elections on this party's ticket, but was defeated by the Congress Party candidate Chowdhary Sunder Singh (an Ad-Dharmi), but was defeated by the latter mainly due to lack of support from his own community, because Arya Samaj had also fielded Bhagat Gopi Chand (another Megh) just to erode his mass base and thus to take revenge! Later on, after December 1945, with the support of Unionist Party of India and the Ad-Dharm Mandal, Advocate Hans Raj was nominated to the Legislative Council.
Rattan Gottra
10/09/2014 22:34
Rattan Gottra
कुछ संकेत यहाँ उपलब्ध हो सकते हैं.

02-11-2017

श्री आर एल गोत्रा जी ने ही सबसे पहले एडवोकेट हंसराज भगत जी के बारे में जो बताया था वो मैंने यहाँ दर्ज कर दिया था. जो छुटपुट बातें अन्य से प्राप्त हुई उसे भी साथ ही दर्ज कर दिया. पहला रिकार्ड लुधियाना के श्री सुरजीत सिंह भगत से मिला. उन्होंने तब की पंजाब विधानसभा के सदस्यों की एक फोटो उपलब्ध कराई थी. उन्होंने यह भी बताया कि उनको मिली जानकारी के अनुसार भगत हंसराज जी का बेटा इंडियन एयरलाइंस में था. आज (01-11-2017) को जोधपुर से ताराराम जी ने एक पुस्तक के कुछ पृष्ठों की फोटो प्रतियां भेजी हैं जिनमें तब की पंजाब विधान सभा का कुछ रिकार्ड उपलब्ध है. उससे पता चलता है कि एडवोकेट भगत हंसराज उस विधान सभा के मंत्रीमंडल में पार्लियामेंट्री प्राईवेट सेक्रेटरी रहे थे. नई जानकारी के संदर्भ में आज फिर गोत्रा जी से बात हुई. उन्होंने बताया कि भगत हंसराज भगत का उल्लेख अमेरिका के महान विद्वान मार्क योर्गन्समायर (Mark Juergensmeyer) की पुस्तक ‘रिलीजियस रिबेल्स ऑफ पंजाब’ में भी आया है. कुछ और विवरण ताराराम जी से प्रतीक्षित है.








गज़ट के नीचे बाईं ओर भगत जी के नोटरी के तौर पर नियुक्त होने की बात का उल्लेख है.
This is screenshot from the book 'Religious Rebels of Punjab' written by Mark Juergensmeyer

MEGHnet